प्रकृतिमातुः रक्षणं परमौ धर्मः
Prakriti Rakshak
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विषय: 'प्रकृति रक्षक संगठन' की 'वरिष्ठ सलाहकार परिषद' व मेंटॉर बोर्ड में जुड़ने हेतु सादर आमंत्रण।
आदरणीय सर / मैडम जी,
जय हिंद!
शिक्षा, प्रशिक्षण, हुनर, सुरक्षा और समाज-सेवा में आपके अमूल्य योगदान के प्रति गहरा आदर व्यक्त करते हुए, मैं यह पत्र एक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी के एक ऋणी के रूप में लिख रहा हूँ।
अगर मैं अपने बारे में कहूँ, तो मैं मुख्य सेवक / राष्ट्र-निर्माण दूत राजेन्द्र सिंह... मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन साल एक सैनिक के रूप में देश की सेवा में समर्पित किए। पैरा मिलिट्री से लेकर NSG (ब्लैक कैट कमांडो) के कार्यकाल का वो अनूठा अनुभव मेरी सेवा यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। देश की सरहदें देखीं और फ़ौज का वो अटूट अनुशासन जिया, जो आज भी मेरी रगों में लहू बनकर बहता है।
फ़ौज की कठिन सेवा के साथ जब किताबों की दुनिया में कदम रखा, तो एक के बाद एक डिग्रियों का पहाड़ खड़ा कर दिया... B.L.I.Sc., M.L.I.Sc., M.A. (Sociology), M.A. (Hindi) और PG Diploma in Fire Safety & Disaster Management! लेकिन डिग्रियों के इस पहाड़ के बाद भी जब मैंने खुद को देखा, तो अचानक अपने ही भीतर एक कड़वा सन्नाटा छाया और मुझे ठगा सा अहसास हुआ। मन ने मुझसे सवाल पूछा—'राजेन्द्र! जिस गाँव की मिट्टी में तू किलकारियाँ मारता हुआ बड़ा हुआ, जिन अनपढ़ बुज़ुर्गों की गोद में खेलकर तूने चलना सीखा, जिस आँगन और गलियों ने तुझे इंसान बनाया... इतने बड़े-बड़े ओहदे और कागज़ के टुकड़े पाकर तूने अपनी उस मिट्टी और समाज को वापस क्या दिया?'
तभी मेरी आँखें खुलीं। किताबी डिग्रियां मुझे नौकरी और सम्मान तो दिला सकती थीं, लेकिन जीवन का वो सच्चा ज्ञान, संस्कार, भाईचारा और ईमानदारी दूर-दूर तक नहीं दे पाईं, जो मेरे गाँव के उन अनपढ़ बुज़ुर्गों के पास सहज बसी थी। वही बुज़ुर्ग, जिन्होंने बिना किसी यूनिवर्सिटी या सोशल मीडिया के पूरे कुनबे को जोड़े रखा और इस देश को 'विश्वगुरु' की पहचान दी।
इसी आत्म-बोध और कसक से जन्म हुआ 'प्रकृति रक्षक संगठन (NGO)' का। यह कोई संस्था नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी का कर्ज़ चुकाने और अपने बुज़ुर्गों की 'संस्कारों की पाठशाला' को पुनर्जीवित करने की एक ईमानदार कोशिश है।
हमारी मुहिम और आपका अमूल्य साथ
आज गाँव और समाज में प्रतिभा और देशभक्ति की कमी नहीं है, बस सही मार्गदर्शन और एक साझा मंच की आवश्यकता है। इस अभियान की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें समाज का हर व्यक्ति जुड़ सकता है—चाहे वह प्रशासनिक अधिकारी हो, हुनरमंद कारीगर हो या फिर कोई निरक्षर ही क्यों न हो!
आप अपनी रुचि और सुविधानुसार कैसे योगदान दे सकते हैं?
- निःशुल्क शिक्षा व कौशल विकास (Skill Trainers)आपके पास कोई भी हुनर हो—चाहे खेती-किसानी, पशुपालन, कंप्यूटर, फैशन डिजाइनिंग, हस्तशिल्प (Handicraft) या इंटीरियर डिजाइनिंग—आप गाँव के युवाओं और बच्चों को सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
- प्रशासनिक, पुलिस व कानून सेवा सहयोगपूर्व/वर्तमान पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी या कानून से जुड़े लोग समाज में सुरक्षा, जागरूकता, राष्ट्र-समर्पण, नशा-मुक्ति अभियान और असमाजिक गतिविधियों पर नज़र रखने में अपना मार्गदर्शन दे सकते हैं।
- निरक्षर बुज़ुर्गों व ग्रामीणों का योगदानजो लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं, वे अपने व्यावहारिक जीवन-अनुभव, पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण व साफ़-सफ़ाई और गाँव की समस्याओं के सही समाधान द्वारा मार्गदर्शक बन सकते हैं।
समय का कोई बंधन नहीं: आप अपनी सुविधानुसार समय दे सकते हैं—दिन में 1 घंटा, सप्ताह में 1 घंटा, 15 दिन में 1 घंटा या महीने में केवल 1 घंटा! आपका यह छोटा सा प्रयास किसी का जीवन बदल सकता है।
पर्यावरण व स्वच्छता अभियान: आप पौधरोपण, गाँव-मोहल्ले की सफ़ाई और प्रकृति संरक्षण के जमीनी कार्यों में सीधे भाग ले सकते हैं।
मानद पद व सम्मान: समाज, राष्ट्र और कौशल विकास के क्षेत्र में आपके अमूल्य योगदान को देखते हुए, संस्था के 'वरिष्ठ मेंटॉर बोर्ड' (Honorary Advisory Council) में आपको 'मुख्य संरक्षक / मानद मेंटॉर' (Honorary Senior Advisor) का सर्वोच्च सम्मानजनक स्थान अर्पित किया जाएगा।
आइए, पदों की गरिमा और किताबी अहंकार से परे हटकर, अपनी मिट्टी के कर्ज़ और बुज़ुर्गों के दिए संस्कारों को पुनर्जीवित करने की इस पवित्र मुहिम का हिस्सा बनें। आपका समृद्ध जीवन-अनुभव और शुभाशीष ही इस संकल्प को वास्तव में राष्ट्र-निर्माण का आधार स्तंभ बनाएगा।
आपकी सहमति की प्रतीक्षा में,
प्रकृति रक्षक संगठन